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Kavivar Bihari In Hindi – GK In Hindi

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Published: June 19, 2020

bihari ka jeevan parichay

Kavivar Bihari In Hindi – कविवर बिहारी एक श्रृंगारी कवि हैं। इन्होंने दोहे जैसे लघु आकार वाले छन्द में गागर में सागर भर देने का कार्य किया है। प्रख्यात आलोचक श्री पद्मसिंह शर्मा ने इनकी प्रशंसा में लिखा है कि, “बिहारी के दोहों का अर्थ गंगा की विशाल जल-धारा के समान है, जो शिव की जटाओं में समा तो गयी थी, परन्तु उसके बाहर निकलते ही वह इतनी असीम और विस्तृत हो गयी कि लम्बी-चौड़ी धरती में भी सीमित न रह सकी। बिहारी के दोहे रस के सागर हैं, कल्पना के इन्द्रधनुष हैं, भाषा के मेघ हैं। उनमें सौन्दर्य के मादक चित्र अंकित हैं।

बिहारी – Kavivar Bihari

रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी श्रृंगार रस के अद्वितीय कवि थे। इनका जन्म सन् 1603 ई० (सं० 1660 वि०) के लगभग ग्वालियर के निकट बसुवा गोविन्दपुर ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवराय था। इन्हें मथुरा का चौबे ब्राह्मण माना जाता है। अनेक विद्वानों ने इनको ।

आचार्य केशवदास { ‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता) का पुत्र स्वीकार किया है और तत्सम्बन्धी प्रमाण भी प्रस्तुत किये हैं। इन्होंने निम्बार्क सम्प्रदाय के अनुयायी स्वामी नरहरिदास से संस्कृत, प्राकृत आदि का अध्ययन किया था। इन्होंने युवावस्था अपनी ससुराल मथुरा में बितायी थी।

मुगल बादशाह शाहजहाँ के निमन्त्रण पर ये आगरा चले गये और उसके बाद जयपुर के राजा जयसिंह के दरबारी कवि हो गये। राजा जयसिंह अपनी नवविवाहिता पत्नी के प्रेम-पाश में फंसकर जब राजकार्य को चौपट कर बैठे थे |

तब बिहारी ने राजा की मोहनिद्रा भंग करने के लिए निम्नलिखित अन्योक्तिपूर्ण दोहा लिखकर उनके पास भेजा

  1. — नहिं पराग नहि मधुर मधु, नहि बिकासु इहि काल।।
  2. __ अली कली ही सौं बँध्यो, आगै कौन हवाल॥

इस दोहे को पढ़कर राजा की आँखें खुल गयीं और वे पुनः कर्तव्य-पथ पर अग्रसर हो गये। राजा जयसिंह की प्रेरणा पाकर बिहारी सुन्दर-सुन्दर दोहों की रचना करते थे और पुरस्कारस्वरूप प्रत्येक दोहे पर एक स्वर्ण-मुद्रा प्राप्त करते थे। बाद में पत्नी की मृत्यु के कारण श्रृंगारी कवि बिहारी का मन भक्ति और वैराग्य की ओर मुड़ गया।

723 दोहों की सतसई सन् 1662 ई० में समाप्त हुई मानी जाती है। सन् 1663 ई० (सं० 1720 वि०) में इनकी मृत्यु हो गयी। –

रचनाए— Kavivar Bihari

बिहारी की एकमात्र रचना ‘बिहारी सतसई है। यह श्रृंगार रसप्रधान मुक्तक काव्य-ग्रन्थ है। श्रृंगार की अधिकता होने के कारण बिहारी मुख्य रूप से श्रृंगार रस के कवि माने जाते हैं। इन्होंने छोटेसे . दोहे में प्रेम-लीला के गूढ़-से-गूढ़ प्रसंगों को अंकित किया है। इनके दोहों के विषय में कहा गया है सतसैया के दोहरे, ज्यौं नाविक के तीर। देखने में छोटे लगैं, घाव करै गम्भीर || साहित्य में स्थानरीतिकालीन कवि बिहारी अपने ढंग के अद्वितीय कवि हैं।

इनकी विलक्षण सृजन-प्रतिभा के कारण काव्य-संसार ने इन्हें महाकवि के पद पर प्रतिष्ठित किया है। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र का कहना है कि, “प्रेम के भीतर उन्होंने सब प्रकार की सामग्री, सब प्रकार के वर्णन प्रस्तुत किये हैं और वह भी इन्हीं  सात-सौ दोहों में।

यह उनकी एक विशेषता ही है। नायिका-भेद या श्रृंगार का लक्षण-ग्रन्थ लिखने वाले भी किसी नायिका या अलंकारादि का वैसा उदाहरण प्रस्तुत करने में समर्थ नहीं हुए जैसा बिहारी ने किया है। हमें यह भी मान लेने में आनाकानी नहीं करनी चाहिए कि उनके जोड़ का हिन्दी में कोई दूसरा कवि नहीं हुआ।

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